"जनजाति और अनुसूचित जनजाति: अर्थ, परिभाषा और विशेषताएँ"
"जनजाति और अनुसूचित जनजाति: अर्थ, परिभाषा और विशेषताएँ"
प्रस्तावना:
आदिवासी, वनवासी, आदिम जाति, और वन्य जाति जैसे शब्द उन मानव समूहों के लिए उपयोग किए जाते हैं जो मुख्य रूप से जंगलों, पहाड़ों और आंतरिक गुफाओं में निवास करते हैं। ये समाज पारंपरिक रूप से वनों में रहते हैं और उनकी जीवनशैली इन जंगलों से गहरे तौर पर जुड़ी होती है। इन समूहों को आमतौर पर 'जनजाति' के नाम से जाना जाता है। भारतीय संविधान में इन्हें "अनुसूचित जनजातियाँ" (Scheduled Tribes) कहा गया है, जिनके लिए विशेष अधिकार और संरक्षण प्रदान किए गए हैं।
लेकिन इन समाजों का सही समझ प्राप्त करने के लिए, सबसे पहले 'जनजाति' की परिभाषा, आशय और उनकी विशेषताओं को जानना आवश्यक है, ताकि हम इन समूहों के सामाजिक, सांस्कृतिक, और ऐतिहासिक पहलुओं को सही तरीके से समझ सकें।
जनजाति (Tribe) की परिभाषा एवं आशय
जनजाति एक सामाजिक समूह है जो अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, और सामाजिक विशेषताओं के लिए पहचाना जाता है। इन समूहों के सदस्य अपने आप को एक अलग पहचान के रूप में देखते हैं, जो अन्य समाजों से अलग होती है। यह पहचान आमतौर पर उनके रीति-रिवाजों, भाषा, धर्म, पारंपरिक जीवनशैली, और सामाजिक संगठन से जुड़ी होती है। जनजातियां आमतौर पर एक विशिष्ट भूगोलिक क्षेत्र में निवास करती हैं और उनमें परंपरागत जीवन शैली को बनाए रखने की प्रवृत्ति होती है।
परिभाषाऍं
डॉ. रिवर्स - ने सामान्य निवास-स्थान को महत्व न देते हुए जनजाति को ऐसे सरल प्रकार का सामाजिक समूह बताया है जिसके सदस्य एक सामान्य भाषा को प्रयोग करते हों तथा युद्ध आदि सामान्य उद्देश्यों के जिए संम्मिलित रूप से कार्य करते हो।
डॉ. मजूमदार - इन्होने अपनी परिभाषा में एक जनजाति की सभी विशेषताओं को स्पष्ट किया है। आपके मतानुसार, 'एक जनजाति परिवारों या परिवारों के समूह का एक संकलन है, जिनका एक सामान्य नाम होता है, जिनके सदस्य एक निश्चित भू-भाग पर रहते हैख्, सामान्य भाषा में बोलते है और विवाह, व्यवसाय, के विषय में कुछ निषेधों का पालन करते है और एक निश्चित एवं उपयोगी परस्पर आदान-प्रदान की व्यवस्था का विकास करते हे।
जनजाति की भारतिय संविधान में परिभाषा: भारत के संविधान के अनुच्छेद 366 (25) के तहत, जनजाति को एक "सामाजिक और सांस्कृतिक समूह" के रूप में परिभाषित किया गया है, जो अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक, सामाजिक, और आर्थिक पहचान बनाए रखता है। इन जनजातियों के सदस्य सामान्यत: कृषि, शिकार, या जंगलों से संबंधित पारंपरिक कार्यों में संलग्न रहते हैं और इनकी जीवनशैली में कुछ विशिष्टताएँ होती हैं।
जनजाति के विशेषताएँ:
परिवारों का एक समूह है- जनजाति को समझने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि इसे एक परिवारों के समूह के रूप में देखा जाए। अधिकांश जनजाति विद्वानों ने इस तथ्य को स्वीकार किया है कि एक जनजाति समान भाषा बोलने वाले और समान सामाजिक लक्षणों वाले परिवारों का समूह होती है। यह संरचना इस प्रकार काम करती है: कुछ परिवार मिलकर एक नातेदारी समूह बनाते हैं, और कई नातेदारी समूह मिलकर एक संबंध प्रथा का निर्माण करते हैं। अंततः, अनेक संबंध प्रथाएँ मिलकर एक जनजाति का रूप धारण करती हैं। इस प्रकार, यह कहा जा सकता है कि जनजाति वास्तव में परिवारों का एक बड़ा समूह है, जो सामाजिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक रूप से आपस में जुड़े होते हैं।
सामान्य भाषा: सामान्यत: प्रत्येक जनजाति की अपनी विशिष्ट भाषा होती है। कुछ जनजातियाँ, जिनकी जनसंख्या छोटी होती है और जिन्होंने अपनी लिपि का विकास नहीं किया है, वे स्थानीय बोलियों का इस्तेमाल करती हैं। इन जनजातियों के लोग अपनी भाषा और संस्कृति को स्थानीय बोलियों के माध्यम से व्यक्त करते हैं।
सांस्कृतिक विशेषताएँ: जनजातियों के पास अपनी अलग भाषा, रीति-रिवाज, नृत्य, संगीत, परिधान और धार्मिक विश्वास होते हैं। उनकी संस्कृति को बाहरी समाज से अलग माना जाता है, और उनके सामाजिक संरचनाओं में परंपराओं की बड़ी भूमिका होती है।
सुरक्षात्मक संगठन: प्रत्येक जनजाति अपनी सुरक्षा का प्रबंध स्वतंत्र सुरक्षात्मक संगठनों के माध्यम से करती है। वर्तमान समय में जो जनजातियाँ मुख्य धारा में शामिल हो चुकी हैं, उनमें यह विशेषता दिखाई नहीं देती, लेकिन सीमांत जनजातियाँ, जैसे नागा, निकोबारी, जाखा, चेंचू और कादर जैसी जनजातियाँ आज भी अपनी सुरक्षा के लिए स्वतंत्र संगठनों का उपयोग करती हैं। इन जनजातियों में सुरक्षात्मक संरचनाएँ अब भी जीवित हैं, जो उनके पारंपरिक जीवनशैली का हिस्सा हैं।
आर्थिक जीवन: जनजातियाँ सामान्यत: कृषि, शिकार, मछली पकड़ने, वनोपज संग्रहण, और कारीगरी जैसी पारंपरिक विधियों से अपने जीवनयापन का साधन प्राप्त करती हैं। इनकी आर्थिक गतिविधियाँ बाहरी दुनिया से प्रायः स्वतंत्र होती हैं।
सामाजिक संगठन: जनजातियों में परंपरागत रूप से समाज का संगठन समुदाय आधारित होता है। इनके पास अपने पारंपरिक कबीला संगठन, कबीला प्रमुख (मुखिया), या पारंपरिक अदालतें होती हैं, जो मामलों को हल करती हैं।
भौगोलिक स्थिति: जनजातियाँ अधिकतर पहाड़ी क्षेत्रों, जंगलों, और अन्य दूरदराज के इलाकों में निवास करती हैं, जहां बाहरी प्रभाव कम होते हैं।
धार्मिक विश्वास: जनजातियों के धार्मिक विश्वास भी प्रायः उनकी सांस्कृतिक पहचान से जुड़े होते हैं। वे अधिकतर प्रकृति पूजा, लोक धार्मिक विश्वास, और आदिवासी देवताओं की पूजा करते हैं।
राजनीतिक संरचना: प्रत्येक जनजाति का एक विशेष राजनीतिक संगठन होता है। आदिम राजनीतिक संगठनों से लेकर आधुनिक राजनीतिक व्यवस्थाओं तक, जनजातियों ने अपने इस संगठन को संरक्षित रखा है। विभिन्न जनजातियों में राजनीतिक संगठन के तरीके अलग हो सकते हैं। भारत की जनजातियों में अधिकांशत: गौत्र और आयु के आधार पर संगठन बनाए जाते हैं। ये संगठन जनजातियों की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
संविधानिक परिभाषा: भारत के संविधान में "जनजाति" का विशेष महत्व है, और इनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए विभिन्न उपाय किए गए हैं। भारत में जनजातियों के लिए "अनुसूचित जनजाति" (Scheduled Tribes) का वर्गीकरण किया गया है, जिसका उद्देश्य इनकी सामाजिक और आर्थिक भलाई को सुनिश्चित करना है। अनुसूचित जनजाति के सदस्य भारतीय संविधान में दिए गए अधिकारों का लाभ उठा सकते हैं जैसे कि आरक्षित सीटें, विशेष शैक्षिक और आर्थिक योजनाएँ, और सामाजिक सुरक्षा।
निष्कर्ष:
'जनजाति' और 'अनुसूचित जनजाति' भारतीय समाज का अहम हिस्सा हैं, जो अपनी सांस्कृतिक, सामाजिक और भौगोलिक पहचान बनाए रखते हैं। इनका जीवन पारंपरिक रूप से प्रकृति से जुड़ा होता है, और भारतीय संविधान ने इन्हें विशेष अधिकार और संरक्षण प्रदान किया है। जनजातियों की परंपराएँ और उनकी विशिष्ट पहचान उन्हें अन्य समाजों से अलग करती हैं। इनकी भलाई के लिए संविधान द्वारा कई योजनाएँ बनाई गई हैं, जो उनके सामाजिक और आर्थिक सुधार के लिए कारगर हैं। इसलिए, इन जनजातियों के सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं को समझना और उनके विकास के लिए ठोस कदम उठाना आवश्यक है।
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